॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.76.1
अथ षट्सप्ततितमोऽध्यायः
शाल्वके साथ यादवोंका युद्ध
श्रीशुक उवाच
अथान्यदपि कृष्णस्य शृणु कर्माद्भुतं नृप।
क्रीडानरशरीरस्य यथा सौभपतिर्हतः॥ १
athānyadapi kṛṣṇasya śṛṇu karmādbhutaṃ nṛpa|
krīḍānaraśarīrasya yathā saubhapatirhataḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब मनुष्यकी-सी लीला करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णका एक और भी अद्भुत चरित्र सुनो। इसमें यह बताया जायगा कि सौभनामक विमानका अधिपति शाल्व किस प्रकार भगवान्के हाथसे मारा गया॥ १॥ शाल्व शिशुपालका सखा था और रुक्मिणीके विवाहके अवसरपर बारातमें शिशुपालकी ओरसे आया हुआ था। उस समय यदुवंशियोंने युद्धमें जरासन्ध आदिके साथ-साथ शाल्वको भी जीत लिया था॥ २॥ उस दिन सब राजाओंके सामने शाल्वने यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं पृथ्वीसे यदुवंशियोंको मिटाकर छोड़ूँगा, सब लोग मेरा बल-पौरुष देखना’॥ ३॥