परीक्षित्! मय दानवका बनाया हुआ शाल्वका वह विमान अत्यन्त मायामय था। वह इतना विचित्र था कि कभी अनेक रूपोंमें दीखता तो कभी एक रूपमें, कभी दीखता तो कभी न भी दीखता। यदुवंशियोंको इस बातका पता ही न चलता कि वह इस समय कहाँ है॥ २१॥
बहुरूपैकरूपं तद् दृश्यते न च दृश्यते।
मायामयं मयकृतं दुर्विभाव्यं परैरभूत्॥ २१
परीक्षित्! मय दानवका बनाया हुआ शाल्वका वह विमान अत्यन्त मायामय था। वह इतना विचित्र था कि कभी अनेक रूपोंमें दीखता तो कभी एक रूपमें, कभी दीखता तो कभी न भी दीखता। यदुवंशियोंको इस बातका पता ही न चलता कि वह इस समय कहाँ है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.76.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 604) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/76/21/