श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.76.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 76 · अथ षट्सप्ततितमोऽध्यायः

लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन कार्ष्णिः सारथिमब्रवीत्।

अहो असाध्विदं सूत यद् रणान्मेऽपसर्पणम्॥ २८

labdhasaṃjño muhūrtena kārṣṇiḥ sārathimabravīt|

aho asādhvidaṃ sūta yad raṇānme'pasarpaṇam|| 28

अर्थ

दो घड़ीमें प्रद्युम्‍नजीकी मूर्च्छा टूटी। तब उन्होंने सारथिसे कहा—‘सारथे! तूने यह बहुत बुरा किया। हाय, हाय! तू मुझे रणभूमिसे हटा लाया?॥ २८॥

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