॥ श्रीहरिः ॥
लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन कार्ष्णिः सारथिमब्रवीत्।
अहो असाध्विदं सूत यद् रणान्मेऽपसर्पणम्॥ २८
labdhasaṃjño muhūrtena kārṣṇiḥ sārathimabravīt|
aho asādhvidaṃ sūta yad raṇānme'pasarpaṇam|| 28
अर्थ
दो घड़ीमें प्रद्युम्नजीकी मूर्च्छा टूटी। तब उन्होंने सारथिसे कहा—‘सारथे! तूने यह बहुत बुरा किया। हाय, हाय! तू मुझे रणभूमिसे हटा लाया?॥ २८॥
लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन कार्ष्णिः सारथिमब्रवीत्।
अहो असाध्विदं सूत यद् रणान्मेऽपसर्पणम्॥ २८
दो घड़ीमें प्रद्युम्नजीकी मूर्च्छा टूटी। तब उन्होंने सारथिसे कहा—‘सारथे! तूने यह बहुत बुरा किया। हाय, हाय! तू मुझे रणभूमिसे हटा लाया?॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.76.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 605) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/76/28/