श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.76.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 76 · अथ षट्सप्ततितमोऽध्यायः

सारथिरुवाच

धर्मं विजानताऽऽयुष्मन् कृतमेतन्मया विभो।

सूतः कृच्छ्रगतं रक्षेद् रथिनं सारथिं रथी॥ ३२

dharmaṃ vijānatā''yuṣman kṛtametanmayā vibho|

sūtaḥ kṛcchragataṃ rakṣed rathinaṃ sārathiṃ rathī|| 32

अर्थ

सारथीने कहा—आयुष्मन्! मैंने जो कुछ किया है, सारथीका धर्म समझकर ही किया है। मेरे समर्थ स्वामी! युद्धका ऐसा धर्म है कि संकट पड़नेपर सारथी रथीकी रक्षा कर ले और रथी सारथीकी॥ ३२॥

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