मैं जानता हूँ कि तू अपनेको अजेय मानता है। यदि मेरे सामने ठहर गया तो मैं आज तुझे अपने तीखे बाणोंसे वहाँ पहुँचा दूँगा, जहाँसे फिर कोई लौटकर नहीं आता’॥ १८॥
तं त्वाद्य निशितैर्बाणैरपराजितमानिनम्।
नयाम्यपुनरावृत्तिं यदि तिष्ठेर्ममाग्रतः॥ १८
मैं जानता हूँ कि तू अपनेको अजेय मानता है। यदि मेरे सामने ठहर गया तो मैं आज तुझे अपने तीखे बाणोंसे वहाँ पहुँचा दूँगा, जहाँसे फिर कोई लौटकर नहीं आता’॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.77.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 608) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/77/18/