श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.77.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 77 · अथ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

गदायां सन्‍निवृत्तायां शाल्वस्त्वन्तरधीयत।

ततो मुहूर्त आगत्य पुरुषः शिरसाच्युतम्।

देवक्या प्रहितोऽस्मीति नत्वा प्राह वचो रुदन्॥ २१

gadāyāṃ sannivṛttāyāṃ śālvastvantaradhīyata|

tato muhūrta āgatya puruṣaḥ śirasācyutam|

devakyā prahito'smīti natvā prāha vaco rudan|| 21

अर्थ

इधर जब गदा भगवान्‌के पास लौट आयी, तब शाल्व अन्तर्धान हो गया। इसके बाद दो घड़ी बीतते-बीतते एक मनुष्यने भगवान्‌के पास पहुँचकर उनको सिर झुकाकर प्रणाम किया और वह रोता हुआ बोला—‘मुझे आपकी माता देवकीजीने भेजा है॥ २१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें