इधर जब गदा भगवान्के पास लौट आयी, तब शाल्व अन्तर्धान हो गया। इसके बाद दो घड़ी बीतते-बीतते एक मनुष्यने भगवान्के पास पहुँचकर उनको सिर झुकाकर प्रणाम किया और वह रोता हुआ बोला—‘मुझे आपकी माता देवकीजीने भेजा है॥ २१॥
गदायां सन्निवृत्तायां शाल्वस्त्वन्तरधीयत।
ततो मुहूर्त आगत्य पुरुषः शिरसाच्युतम्।
देवक्या प्रहितोऽस्मीति नत्वा प्राह वचो रुदन्॥ २१
इधर जब गदा भगवान्के पास लौट आयी, तब शाल्व अन्तर्धान हो गया। इसके बाद दो घड़ी बीतते-बीतते एक मनुष्यने भगवान्के पास पहुँचकर उनको सिर झुकाकर प्रणाम किया और वह रोता हुआ बोला—‘मुझे आपकी माता देवकीजीने भेजा है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.77.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 608) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/77/21/