॥ श्रीहरिः ॥
चतुर्भिश्चतुरो वाहान् सूतमेकेन चाहनत्।
द्वाभ्यां धनुश्च केतुं च शरेणान्येन वै शिरः॥ ३
caturbhiścaturo vāhān sūtamekena cāhanat|
dvābhyāṃ dhanuśca ketuṃ ca śareṇānyena vai śiraḥ|| 3
अर्थ
चार बाणोंसे उसके चार घोड़े और एक-एक बाणसे सारथी, धनुष, ध्वजा और उसका सिर काट डाला॥ ३॥
चतुर्भिश्चतुरो वाहान् सूतमेकेन चाहनत्।
द्वाभ्यां धनुश्च केतुं च शरेणान्येन वै शिरः॥ ३
चार बाणोंसे उसके चार घोड़े और एक-एक बाणसे सारथी, धनुष, ध्वजा और उसका सिर काट डाला॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.77.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 606) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/77/3/