श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

कृष्णस्य गोप्यो रुचिरं वीक्ष्य कौमारचापलम्।

शृण्वत्याः किल तन्मातुरिति होचुः समागताः॥ २८

kṛṣṇasya gopyo ruciraṃ vīkṣya kaumāracāpalam|

śṛṇvatyāḥ kila tanmāturiti hocuḥ samāgatāḥ|| 28

अर्थ

उनके बचपनकी चंचलताएँ बड़ी ही अनोखी होती थीं। गोपियोंको तो वे बड़ी ही सुन्दर और मधुर लगतीं। एक दिन सब-की-सब इकट्ठी होकर नन्दबाबाके घर आयीं और यशोदा माताको सुना-सुनाकर कन्हैयाके करतूत कहने लगीं॥ २८॥✎ 1656

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1656 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: नन्द-बाबाके → नन्दबाबाके

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