श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

यद्येवं तर्हि व्यादेहीत्युक्तः स भगवान् हरिः।

व्यादत्ताव्याहतैश्‍वर्यः क्रीडामनुजबालकः॥ ३६

yadyevaṃ tarhi vyādehītyuktaḥ sa bhagavān hariḥ|

vyādattāvyāhataiśvaryaḥ krīḍāmanujabālakaḥ|| 36

अर्थ

यशोदाजीने कहा—‘अच्छी बात। यदि ऐसा है, तो मुँह खोल।’ माताके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अपना मुँह खोल दिया*। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका ऐश्‍वर्य अनन्त है। वे केवल लीलाके लिये ही मनुष्यके बालक बने हुए हैं॥ ३६॥✎ 1408

टिप्पणियाँ

  1. *

    १—मा! मिट्टी खानेके सम्बन्धमें ये मुझ अकेलेका ही नाम ले रहे हैं। मैंने खायी, तो सबने खायी, देख लो मेरे मुखमें सम्पूर्ण विश्‍व!

    २-श्रीकृष्णने विचार किया कि उस दिन मेरे मुखमें विश्‍व देखकर माताने अपने नेत्र बंद कर लिये थे। आज भी जब मैं अपना मुँह खोलूँगा, तब यह अपने नेत्र बंद कर लेगी। इस विचारसे मुख खोल दिया।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 179)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1408 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ‘माँ! → ‘मा!

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