॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.8.9
इति संचिन्तयञ्छ्रुत्वा देवक्या दारिकावचः।
अपि हन्ताऽऽगताशंकस्तर्हि तन्नोऽनयो भवेत्॥ ९
iti saṃcintayañchrutvā devakyā dārikāvacaḥ|
api hantā''gatāśaṃkastarhi tanno'nayo bhavet|| 9
अर्थ
कंसकी बुद्धि बुरी है, वह पाप ही सोचा करती है। वसुदेवजीके साथ तुम्हारी बड़ी घनिष्ठ मित्रता है। जबसे देवकीकी कन्यासे उसने यह बात सुनी है कि उसको मारनेवाला और कहीं पैदा हो गया है, तबसे वह यही सोचा करता है कि देवकीके आठवें गर्भसे कन्याका जन्म नहीं होना चाहिये। यदि मैं तुम्हारे पुत्रका संस्कार कर दूँ और वह इस बालकको वसुदेवजीका लड़का समझकर मार डाले, तो हमसे बड़ा अन्याय हो जायगा॥ ८-९॥