प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और वे ब्राह्मण दोनों एक-दूसरेका हाथ पकड़कर अपने पूर्वजीवनकी उन आनन्ददायक घटनाओंका स्मरण और वर्णन करने लगे जो गुरुकुलमें रहते समय घटित हुई थीं॥ २७॥
कथयांचक्रतुर्गाथाः पूर्वा गुरुकुले सतोः।
आत्मनो ललिता राजन् करौ गृह्य परस्परम्॥ २७
प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण और वे ब्राह्मण दोनों एक-दूसरेका हाथ पकड़कर अपने पूर्वजीवनकी उन आनन्ददायक घटनाओंका स्मरण और वर्णन करने लगे जो गुरुकुलमें रहते समय घटित हुई थीं॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 622) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/27/