श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

सा वाग् यया तस्य गुणान् गृणीते

करौ च तत्कर्मकरौ मनश्‍च।

स्मरेद् वसन्तं स्थिरजंगमेषु

शृणोति तत्पुण्यकथाः स कर्णः॥ ३

sā vāg yayā tasya guṇān gṛṇīte

karau ca tatkarmakarau manaśca|

smared vasantaṃ sthirajaṃgameṣu

śṛṇoti tatpuṇyakathāḥ sa karṇaḥ|| 3

अर्थ

जो वाणी भगवान्‌के गुणोंका गान करती है, वही सच्ची वाणी है। वे ही हाथ सच्चे हाथ हैं, जो भगवान्‌की सेवाके लिये काम करते हैं। वही मन सच्चा मन है, जो चराचर प्राणियोंमें निवास करनेवाले भगवान्‌का स्मरण करता है; और वे ही कान वास्तवमें कान कहनेयोग्य हैं, जो भगवान्‌की पुण्यमयी कथाओंका श्रवण करते हैं ॥ ३॥

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