॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.80.4
शिरस्तु तस्योभयलिंगमानमे-
त्तदेव यत् पश्यति तद्धि चक्षुः।
अंगानि विष्णोरथ तज्जनानां
पादोदकं यानि भजन्ति नित्यम्॥ ४
śirastu tasyobhayaliṃgamāname-
ttadeva yat paśyati taddhi cakṣuḥ|
aṃgāni viṣṇoratha tajjanānāṃ
pādodakaṃ yāni bhajanti nityam|| 4
अर्थ
वही सिर सिर है, जो चराचर जगत्को भगवान्की चल-अचल प्रतिमा समझकर नमस्कार करता है; और जो सर्वत्र भगवद्विग्रहका दर्शन करते हैं, वे ही नेत्र वास्तवमें नेत्र हैं। शरीरके जो अंग भगवान् और उनके भक्तोंके चरणोदकका सेवन करते हैं, वे ही अंग वास्तवमें अंग हैं; सच पूछिये तो उन्हींका होना सफल है॥ ४॥