श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

स वै सत्कर्मणां साक्षाद् द्विजातेरिह सम्भवः।

आद्योऽङ्ग यत्राश्रमिणां यथाहं ज्ञानदो गुरुः॥ ३२

sa vai satkarmaṇāṃ sākṣād dvijāteriha sambhavaḥ|

ādyo'ṅga yatrāśramiṇāṃ yathāhaṃ jñānado guruḥ|| 32

अर्थ

मित्र! इस संसारमें शरीरका कारण—जन्मदाता पिता प्रथम गुरु है। इसके बाद उपनयन-संस्कार करके सत्कर्मोंकी शिक्षा देनेवाला दूसरा गुरु है। वह मेरे ही समान पूज्य है। तदनन्तर ज्ञानोपदेश करके परमात्माको प्राप्त करानेवाला गुरु तो मेरा स्वरूप ही है। वर्णाश्रमियोंके ये तीन गुरु होते हैं॥ ३२॥

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