उस समय हमलोग एक घोर जंगलमें गये हुए थे और बिना ऋतुके ही बड़ा भयंकर आँधी-पानी आ गया था। आकाशमें बिजली कड़कने लगी थी॥ ३६॥
प्रविष्टानां महारण्यमपर्तौ सुमहद् द्विज।
वातवर्षमभूत्तीव्रं निष्ठुराः स्तनयित्नवः॥ ३६
उस समय हमलोग एक घोर जंगलमें गये हुए थे और बिना ऋतुके ही बड़ा भयंकर आँधी-पानी आ गया था। आकाशमें बिजली कड़कने लगी थी॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 623) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/80/36/