॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.80.37
सूर्यश्चास्तं गतस्तावत् तमसा चावृता दिशः।
निम्नं कूलं जलमयं न प्राज्ञायत किंचन॥ ३७
sūryaścāstaṃ gatastāvat tamasā cāvṛtā diśaḥ|
nimnaṃ kūlaṃ jalamayaṃ na prājñāyata kiṃcana|| 37
अर्थ
तबतक सूर्यास्त हो गया; चारों ओर अँधेरा-ही-अँधेरा फैल गया। धरतीपर इस प्रकार पानी-ही-पानी हो गया कि कहाँ गड्ढा है, कहाँ किनारा, इसका पता ही न चलता था॥ ३७॥