पतिदेवका शुभागमन सुनकर ब्राह्मणीको अपार आनन्द हुआ और वह हड़बड़ाकर जल्दी-जल्दी घरसे निकल आयी, वह ऐसी मालूम होती थी मानो मूर्तिमती लक्ष्मीजी ही कमलवनसे पधारी हों॥ २५॥
पतिमागतमाकर्ण्य पत्न्युद्धर्षातिसम्भ्रमा।
निश्चक्राम गृहात्तूर्णं रूपिणी श्रीरिवालयात्॥ २५
पतिदेवका शुभागमन सुनकर ब्राह्मणीको अपार आनन्द हुआ और वह हड़बड़ाकर जल्दी-जल्दी घरसे निकल आयी, वह ऐसी मालूम होती थी मानो मूर्तिमती लक्ष्मीजी ही कमलवनसे पधारी हों॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.81.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 627) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/81/25/