॥ श्रीहरिः ॥
स्वच्छस्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च।
रत्नदीपा भ्राजमाना ललनारत्नसंयुताः॥ ३१
svacchasphaṭikakuḍyeṣu mahāmārakateṣu ca|
ratnadīpā bhrājamānā lalanāratnasaṃyutāḥ|| 31
अर्थ
स्फटिकमणिकी स्वच्छ भीतोंपर पन्नेकी पच्चीकारी की हुई थी। रत्ननिर्मित स्त्रीमूर्तियोंके हाथोंमें रत्नोंके दीपक जगमगा रहे थे॥ ३१॥
स्वच्छस्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च।
रत्नदीपा भ्राजमाना ललनारत्नसंयुताः॥ ३१
स्फटिकमणिकी स्वच्छ भीतोंपर पन्नेकी पच्चीकारी की हुई थी। रत्ननिर्मित स्त्रीमूर्तियोंके हाथोंमें रत्नोंके दीपक जगमगा रहे थे॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.81.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 628) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/81/31/