श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.81.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · अथैकाशीतितमोऽध्यायः

विलोक्य ब्राह्मणस्तत्र समृद्धीः सर्वसम्पदाम्।

तर्कयामास निर्व्यग्रः स्वसमृद्धिमहैतुकीम्॥ ३२

vilokya brāhmaṇastatra samṛddhīḥ sarvasampadām|

tarkayāmāsa nirvyagraḥ svasamṛddhimahaitukīm|| 32

अर्थ

इस प्रकार समस्त सम्पत्तियोंकी समृद्धि देखकर और उसका कोई प्रत्यक्ष कारण न पाकर, बड़ी गम्भीरतासे ब्राह्मणदेवता विचार करने लगे कि मेरे पास इतनी सम्पत्ति कहाँसे आ गयी॥ ३२॥

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