वे मन-ही-मन कहने लगे—‘मैं जन्मसे ही भाग्यहीन और दरिद्र हूँ। फिर मेरी इस सम्पत्ति-समृद्धिका कारण क्या है? अवश्य ही परमैश्वर्यशाली यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णके कृपाकटाक्षके अतिरिक्त और कोई कारण नहीं हो सकता॥ ३३॥
नूनं बतैतन्मम दुर्भगस्य शश्वद्दरिद्रस्य समृद्धिहेतुः।
महाविभूतेरवलोकतोऽन्यो नैवोपपद्येत यदूत्तमस्य॥ ३३
वे मन-ही-मन कहने लगे—‘मैं जन्मसे ही भाग्यहीन और दरिद्र हूँ। फिर मेरी इस सम्पत्ति-समृद्धिका कारण क्या है? अवश्य ही परमैश्वर्यशाली यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णके कृपाकटाक्षके अतिरिक्त और कोई कारण नहीं हो सकता॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.81.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 628) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/33/