श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.81.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · अथैकाशीतितमोऽध्यायः

एतद् ब्रह्मण्यदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मण्यतां नरः।

लब्धभावो भगवति कर्मबन्धाद् विमुच्यते॥ ४१

etad brahmaṇyadevasya śrutvā brahmaṇyatāṃ naraḥ|

labdhabhāvo bhagavati karmabandhād vimucyate|| 41

अर्थ

परीक्षित्! ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव माननेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी इस ब्राह्मणभक्तिको जो सुनता है, उसे भगवान्‌के चरणोंमें प्रेमभाव प्राप्त हो जाता है और वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४१॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
पृथुकोपाख्यानं नामैकाशीतितमोऽध्यायः॥ ८१॥

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