श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.81.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · अथैकाशीतितमोऽध्यायः

एवं स विप्रो भगवत्सुहृत्तदा

दृष्ट्वा स्वभृत्यैरजितं पराजितम्।

तद्ध्यानवेगोद्ग्रथितात्मबन्धन-

स्तद्धाम लेभेऽचिरतः सतां गतिम्॥ ४०

evaṃ sa vipro bhagavatsuhṛttadā

dṛṣṭvā svabhṛtyairajitaṃ parājitam|

taddhyānavegodgrathitātmabandhana-

staddhāma lebhe'cirataḥ satāṃ gatim|| 40

अर्थ

इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे सखा उस ब्राह्मणने देखा कि ‘यद्यपि भगवान् अजित हैं, किसीके अधीन नहीं हैं; फिर भी वे अपने सेवकोंके अधीन हो जाते हैं, उनसे पराजित हो जाते हैं,’ अब वे उन्हींके ध्यानमें तन्मय हो गये। ध्यानके आवेगसे उनकी अविद्याकी गाँठ कट गयी और उन्होंने थोड़े ही समयमें भगवान्‌का धाम, जो कि संतोंका एकमात्र आश्रय है, प्राप्त किया॥ ४०॥

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