और बड़े आदरसे कहने लगे—‘प्यारे मित्र! यह तो तुम मेरे लिये अत्यन्त प्रिय भेंट ले आये हो। ये चिउड़े न केवल मुझे, बल्कि सारे संसारको तृप्त करनेके लिये पर्याप्त हैं’॥ ९॥
नन्वेतदुपनीतं मे परमप्रीणनं सखे।
तर्पयन्त्यंग मां विश्वमेते पृथुकतण्डुलाः॥ ९
और बड़े आदरसे कहने लगे—‘प्यारे मित्र! यह तो तुम मेरे लिये अत्यन्त प्रिय भेंट ले आये हो। ये चिउड़े न केवल मुझे, बल्कि सारे संसारको तृप्त करनेके लिये पर्याप्त हैं’॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.81.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 625) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/9/