श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.81.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · अथैकाशीतितमोऽध्यायः

नन्वेतदुपनीतं मे परमप्रीणनं सखे।

तर्पयन्त्यंग मां विश्‍वमेते पृथुकतण्डुलाः॥ ९

nanvetadupanītaṃ me paramaprīṇanaṃ sakhe|

tarpayantyaṃga māṃ viśvamete pṛthukataṇḍulāḥ|| 9

अर्थ

और बड़े आदरसे कहने लगे—‘प्यारे मित्र! यह तो तुम मेरे लिये अत्यन्त प्रिय भेंट ले आये हो। ये चिउड़े न केवल मुझे, बल्कि सारे संसारको तृप्त करनेके लिये पर्याप्त हैं’॥ ९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें