श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

कुन्त्युवाच

आर्य भ्रातरहं मन्ये आत्मानमकृताशिषम्।

यद् वा आपत्सु मद्वार्तां नानुस्मरथ सत्तमाः॥ १९

ārya bhrātarahaṃ manye ātmānamakṛtāśiṣam|

yad vā āpatsu madvārtāṃ nānusmaratha sattamāḥ|| 19

अर्थ

कुन्तीने वसुदेवजीसे कहा—भैया! मैं सचमुच बड़ी अभागिन हूँ। मेरी एक भी साध पूरी न हुई। आप-जैसे साधु-स्वभाव सज्जन भाई आपत्तिके समय मेरी सुधि भी न लें, इससे बढ़कर दुःखकी बात क्या होगी?॥ १९॥

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