yad vā āpatsu madvārtāṃ nānusmaratha sattamāḥ|| 19
अर्थ
कुन्तीने वसुदेवजीसे कहा—भैया! मैं सचमुच बड़ी अभागिन हूँ। मेरी एक भी साध पूरी न हुई। आप-जैसे साधु-स्वभाव सज्जन भाई आपत्तिके समय मेरी सुधि भी न लें, इससे बढ़कर दुःखकी बात क्या होगी?॥ १९॥
आर्य भ्रातरहं मन्ये आत्मानमकृताशिषम्।
यद् वा आपत्सु मद्वार्तां नानुस्मरथ सत्तमाः॥ १९
कुन्तीने वसुदेवजीसे कहा—भैया! मैं सचमुच बड़ी अभागिन हूँ। मेरी एक भी साध पूरी न हुई। आप-जैसे साधु-स्वभाव सज्जन भाई आपत्तिके समय मेरी सुधि भी न लें, इससे बढ़कर दुःखकी बात क्या होगी?॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.82.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 632) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/19/