श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

सुहृदो ज्ञातयः पुत्रा भ्रातरः पितरावपि।

नानुस्मरन्ति स्वजनं यस्य दैवमदक्षिणम्॥ २०

suhṛdo jñātayaḥ putrā bhrātaraḥ pitarāvapi|

nānusmaranti svajanaṃ yasya daivamadakṣiṇam|| 20

अर्थ

भैया! विधाता जिसके बाँयें हो जाता है उसे स्वजन-सम्बन्धी, पुत्र और माता-पिता भी भूल जाते हैं। इसमें आपलोगोंका कोई दोष नहीं॥ २०॥

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