समन्तपंचक क्षेत्र वह है, जहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने सारी पृथ्वीको क्षत्रियहीन करके राजाओंकी रुधिरधारासे पाँच बड़े-बड़े कुण्ड बना दिये थे॥ ३॥
निःक्षत्रियां महीं कुर्वन् रामः शस्त्रभृतां वरः।
नृपाणां रुधिरौघेण यत्र चक्रे महाह्रदान्॥ ३
समन्तपंचक क्षेत्र वह है, जहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने सारी पृथ्वीको क्षत्रियहीन करके राजाओंकी रुधिरधारासे पाँच बड़े-बड़े कुण्ड बना दिये थे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.82.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 630) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/82/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1192 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महाहृदान्॥ → महाह्रदान्॥