जैसे कोई साधारण मनुष्य अपने पापकी निवृत्तिके लिये प्रायश्चित्त करता है, वैसे ही सर्वशक्तिमान् भगवान् परशुरामने अपने साथ कर्मका कुछ सम्बन्ध न होनेपर भी लोकमर्यादाकी रक्षाके लिये वहींपर यज्ञ किया था॥ ४॥
ईजे च भगवान् रामो यत्रास्पृष्टोऽपि कर्मणा।
लोकस्य ग्राहयन्नीशो यथान्योऽघापनुत्तये॥ ४
जैसे कोई साधारण मनुष्य अपने पापकी निवृत्तिके लिये प्रायश्चित्त करता है, वैसे ही सर्वशक्तिमान् भगवान् परशुरामने अपने साथ कर्मका कुछ सम्बन्ध न होनेपर भी लोकमर्यादाकी रक्षाके लिये वहींपर यज्ञ किया था॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.82.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 630) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/82/4/