॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.82.49
आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दं
योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः।
संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं
गेहञ्जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः॥ ४९
āhuśca te nalinanābha padāravindaṃ
yogeśvarairhṛdi vicintyamagādhabodhaiḥ|
saṃsārakūpapatitottaraṇāvalambaṃ
gehañjuṣāmapi manasyudiyāt sadā naḥ|| 49
अर्थ
उन्होंने कहा—‘हे कमलनाभ! अगाधबोध-सम्पन्न बड़े-बड़े योगेश्वर अपने हृदयकमलमें आपके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं। जो लोग संसारके कूएँमें गिरे हुए हैं, उन्हें उससे निकलनेके लिये आपके चरणकमल ही एकमात्र अवलम्बन हैं। प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिये कि आपका वह चरणकमल, घर-गृहस्थके काम करते रहनेपर भी सदा-सर्वदा हमारे हृदयमें विराजमान रहे, हम एक क्षणके लिये भी उसे न भूलें॥ ४९॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
वृष्णिगोपसंगमो नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः॥ ८२॥