॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.83.13
सत्योवाच
सप्तोक्षणोऽतिबलवीर्यसुतीक्ष्णशृंगान्
पित्रा कृतान् क्षितिपवीर्यपरीक्षणाय।
तान् वीरदुर्मदहनस्तरसा निगृह्य
क्रीडन् बबन्ध ह यथा शिशवोऽजतोकान्॥ १३
saptokṣaṇo'tibalavīryasutīkṣṇaśṛṃgān
pitrā kṛtān kṣitipavīryaparīkṣaṇāya|
tān vīradurmadahanastarasā nigṛhya
krīḍan babandha ha yathā śiśavo'jatokān|| 13
अर्थ
सत्याने कहा—द्रौपदीजी! मेरे पिताजीने मेरे स्वयंवरमें आये हुए राजाओंके बल-पौरुषकी परीक्षाके लिये बड़े बलवान् और पराक्रमी, तीखे सींगवाले सात बैल रख छोड़े थे। उन बैलोंने बड़े-बड़े वीरोंका घमंड चूर-चूर कर दिया था। उन्हें भगवान्ने खेल-खेलमें ही झपटकर पकड़ लिया, नाथ लिया और बाँध दिया; ठीक वैसे ही, जैसे छोटे-छोटे बच्चे बकरीके बच्चोंको पकड़ लेते हैं॥ १३॥ इस प्रकार भगवान् बल-पौरुषके द्वारा मुझे प्राप्त कर चतुरंगिणी सेना और दासियोंके साथ द्वारका ले आये। मार्गमें जिन क्षत्रियोंने विघ्न डाला, उन्हें जीत भी लिया। मेरी यही अभिलाषा है कि मुझे इनकी सेवाका अवसर सदा-सर्वदा प्राप्त होता रहे॥ १४॥