श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

य इत्थं वीर्यशुक्लां मां दासीभिश्‍चतुरंगिणीम्।

पथि निर्जित्य राजन्यान् निन्ये तद्दास्यमस्तु मे॥ १४

ya itthaṃ vīryaśuklāṃ māṃ dāsībhiścaturaṃgiṇīm|

pathi nirjitya rājanyān ninye taddāsyamastu me|| 14

अर्थ

इस प्रकार भगवान् बल-पौरुषके द्वारा मुझे प्राप्त कर चतुरंगिणी सेना और दासियोंके साथ द्वारका ले आये। मार्गमें जिन क्षत्रियोंने विघ्न डाला, उन्हें जीत भी लिया। मेरी यही अभिलाषा है कि मुझे इनकी सेवाका अवसर सदा-सर्वदा प्राप्त होता रहे॥ १४॥

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