श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

त एवं लोकनाथेन परिपृष्टाः सुसत्कृताः।

प्रत्यूचुर्हृष्टमनसस्तत्पादेक्षाहतांहसः ॥ २

ta evaṃ lokanāthena paripṛṣṭāḥ susatkṛtāḥ|

pratyūcurhṛṣṭamanasastatpādekṣāhatāṃhasaḥ || 2

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका दर्शन करनेसे ही उनके सारे अशुभ नष्ट हो चुके थे। अब जब भगवान् श्रीकृष्णने उनका सत्कार किया, कुशल-मंगल पूछा, तब वे अत्यन्त आनन्दित होकर उनसे कहने लगे—॥ २॥✎ 1440

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1440 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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