श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.83.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 83 · अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः

कुतोऽशिवं त्वच्चरणाम्बुजासवं

महन्मनस्तो मुखनिःसृतं क्‍वचित्।

पिबन्ति ये कर्णपुटैरलं प्रभो

देहम्भृतां देहकृदस्मृतिच्छिदम्॥ ३

kuto'śivaṃ tvaccaraṇāmbujāsavaṃ

mahanmanasto mukhaniḥsṛtaṃ kvacit|

pibanti ye karṇapuṭairalaṃ prabho

dehambhṛtāṃ dehakṛdasmṛticchidam|| 3

अर्थ

‘भगवन्! बड़े बड़े महापुरुष मन-ही-मन आपके चरणारविन्दका मकरन्द रस पान करते रहते हैं। कभी-कभी उनके मुखकमलसे लीला-कथाके रूपमें वह रस छलक पड़ता है। प्रभो! वह इतना अद्भुत दिव्य रस है कि कोई भी प्राणी उसको पी ले तो वह जन्म-मृत्युके चक्करमें डालनेवाली विस्मृति अथवा अविद्याको नष्ट कर देता है। उसी रसको जो लोग अपने कानोंके दोनोंमें भर-भरकर जी-भर पीते हैं, उनके अमंगलकी आशंका ही क्या है?॥ ३॥✎ 1440

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1440 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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