॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.83.31
एवं वृते भगवति म१येशे नृपयूथपाः।
न सेहिरे याज्ञसेनि स्पर्धन्तो हृच्छयातुराः॥ ३१
evaṃ vṛte bhagavati mayeśe nṛpayūthapāḥ|
na sehire yājñaseni spardhanto hṛcchayāturāḥ|| 31
अर्थ
द्रौपदीजी! जब मैंने इस प्रकार अपने स्वामी प्रियतम भगवान्को वरमाला पहना दी, उन्हें वरण कर लिया, तब कामातुर राजाओंको बड़ा डाह हुआ। वे बहुत ही चिढ़ गये॥ ३१॥
टिप्पणियाँ
- १
मयेमे।