चतुर्भुज भगवान्ने अपने श्रेष्ठ चार घोड़ोंवाले रथपर मुझे चढ़ा लिया और हाथमें शार्ङ्गधनुष लेकर तथा कवच पहनकर युद्ध करनेके लिये वे रथपर खड़े हो गये॥ ३२॥
मां तावद् रथमारोप्य हयरत्नचतुष्टयम्।
शार्ङ्गमुद्यम्य सन्नद्धस्तस्थावाजौ चतुर्भुजः॥ ३२
चतुर्भुज भगवान्ने अपने श्रेष्ठ चार घोड़ोंवाले रथपर मुझे चढ़ा लिया और हाथमें शार्ङ्गधनुष लेकर तथा कवच पहनकर युद्ध करनेके लिये वे रथपर खड़े हो गये॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.83.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 641) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/83/32/