॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.84.32
यस्यानुभूतिः कालेन लयोत्पत्त्यादिनास्य वै।
स्वतोऽन्यस्माच्च गुणतो न कुतश्चन रिष्यति॥ ३२
yasyānubhūtiḥ kālena layotpattyādināsya vai|
svato'nyasmācca guṇato na kutaścana riṣyati|| 32
अर्थ
श्रीकृष्णकी अनुभूति समयके फेरसे होनेवाली जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलयसे मिटनेवाली नहीं है। वह स्वतः किसी दूसरे निमित्तसे, गुणोंसे और किसीसे भी क्षीण नहीं होती॥ ३२॥