श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

वित्तैषणां यज्ञदानैर्गृहैर्दारसुतैषणाम्।

आत्मलोकैषणां देव कालेन विसृजेद् बुधः।

ग्रामे त्यक्तैषणाः सर्वे ययुर्धीरास्तपोवनम्॥ ३८

vittaiṣaṇāṃ yajñadānairgṛhairdārasutaiṣaṇām|

ātmalokaiṣaṇāṃ deva kālena visṛjed budhaḥ|

grāme tyaktaiṣaṇāḥ sarve yayurdhīrāstapovanam|| 38

अर्थ

वसुदेवजी! विचारवान् पुरुषको चाहिये कि यज्ञ, दान आदिके द्वारा धनकी इच्छाको, गृहस्थोचित भोगोंद्वारा स्त्री-पुत्रकी इच्छाको और कालक्रमसे स्वर्गादि भोग भी नष्ट हो जाते हैं—इस विचारसे लोकैषणाको त्याग दे। इस प्रकार धीर पुरुष घरमें रहते हुए ही तीनों प्रकारकी एषणाओं—इच्छाओंका परित्याग करके तपोवनका रास्ता लिया करते थे॥ ३८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें