॥ श्रीहरिः ॥
अयं स्वस्त्ययनः पन्था द्विजातेर्गृहमेधिनः।
यच्छ्रद्धयाऽऽप्तवि१त्तेन शुक्लेनेज्येत पूरुषः॥ ३७
ayaṃ svastyayanaḥ panthā dvijātergṛhamedhinaḥ|
yacchraddhayā''ptavittena śuklenejyeta pūruṣaḥ|| 37
अर्थ
अपने न्यायार्जित धनसे श्रद्धापूर्वक पुरुषोत्तमभगवान्की आराधना करना ही द्विजाति—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य गृहस्थके लिये परम कल्याणका मार्ग है॥ ३७॥
अयं स्वस्त्ययनः पन्था द्विजातेर्गृहमेधिनः।
यच्छ्रद्धयाऽऽप्तवित्तेन शुक्लेनेज्येत पूरुषः॥ ३७
अपने न्यायार्जित धनसे श्रद्धापूर्वक पुरुषोत्तमभगवान्की आराधना करना ही द्विजाति—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य गृहस्थके लिये परम कल्याणका मार्ग है॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 648) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/84/37/टिप्पणियाँ
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चित्ते०।
(मुद्रित पृष्ठ 648)