श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

त्वं त्वद्य मुक्तो द्वाभ्यां वै ऋषिपित्रोर्महामते।

यज्ञैर्देवर्णमुन्मुच्य निर्ऋणोऽशरणो भव॥ ४० ✎ 1198 1199

tvaṃ tvadya mukto dvābhyāṃ vai ṛṣipitrormahāmate|

yajñairdevarṇamunmucya nir:ṛṇo'śaraṇo bhava|| 40

अर्थ

परम बुद्धिमान् वसुदेवजी! आप अबतक ऋषि और पितरोंके ऋणसे तो मुक्त हो चुके हैं। अब यज्ञोंके द्वारा देवताओंका ऋण चुका दीजिये; और इस प्रकार सबसे उऋण होकर गृहत्याग कीजिये, भगवान्‌की शरण हो जाइये॥ ४०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1198 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्णोऽशरणो → निऋर्ऋणोऽशरणो
  • #1199 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋणोऽशरणो → निर्ऋणोऽशरणो

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