श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

वसुदेव भवान् नूनं भक्त्या परमया हरिम्।

जगतामीश्‍वरं प्रार्चः स यद् वां पुत्रतां गतः॥ ४१

vasudeva bhavān nūnaṃ bhaktyā paramayā harim|

jagatāmīśvaraṃ prārcaḥ sa yad vāṃ putratāṃ gataḥ|| 41

अर्थ

वसुदेवजी! आपने अवश्य ही परम भक्तिसे जगदीश्‍वरभगवान्‌की आराधना की है; तभी तो वे आप दोनोंके पुत्र हुए हैं॥ ४१॥

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