उस समय भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी अपने-अपने भाई-बन्धु और स्त्री-पुत्रोंके साथ इस प्रकार शोभायमान हुए, जैसे अपनी शक्तियोंके साथ समस्त जीवोंके ईश्वर स्वयं भगवान् समष्टि जीवोंके अभिमानी श्रीसंकर्षण तथा अपने विशुद्ध नारायणस्वरूपमें शोभायमान होते हैं॥ ५०॥
तदा रामश्च कृष्णश्च स्वैः स्वैर्बन्धुभिरन्वितौ।
रेजतुः स्वसुतैर्दारैर्जीवेशौ स्वविभूतिभिः॥ ५०
उस समय भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी अपने-अपने भाई-बन्धु और स्त्री-पुत्रोंके साथ इस प्रकार शोभायमान हुए, जैसे अपनी शक्तियोंके साथ समस्त जीवोंके ईश्वर स्वयं भगवान् समष्टि जीवोंके अभिमानी श्रीसंकर्षण तथा अपने विशुद्ध नारायणस्वरूपमें शोभायमान होते हैं॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 649) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/84/50/