श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.51

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

ईजेऽनुयज्ञं विधिना अग्‍निहोत्रादिलक्षणैः।

प्राकृतैर्वैकृतैर्यज्ञैर्द्रव्यज्ञानक्रियेश्‍वरम् ॥ ५१

īje'nuyajñaṃ vidhinā agnihotrādilakṣaṇaiḥ|

prākṛtairvaikṛtairyajñairdravyajñānakriyeśvaram || 51

अर्थ

वसुदेवजीने प्रत्येक यज्ञमें ज्योतिष्टोम, दर्श, पूर्णमास आदि प्राकृत यज्ञों, सौरसत्रादि वैकृत यज्ञों और अग्‍निहोत्र आदि अन्यान्य यज्ञोंके द्वारा द्रव्य, क्रिया और उनके ज्ञानके—मन्त्रोंके स्वामी विष्णुभगवान्‌की आराधना की॥ ५१॥✎ 1717

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1717 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विष्णु-भगवान्‌की → विष्णुभगवान्‌की

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