श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.65

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं सौहृदशैथिल्यचित्त आनकदुन्दुभिः।

रुरोद तत्कृतां मैत्रीं स्मरन्‍नश्रुविलोचनः॥ ६५

evaṃ sauhṛdaśaithilyacitta ānakadundubhiḥ|

ruroda tatkṛtāṃ maitrīṃ smarannaśruvilocanaḥ|| 65

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार कहते-कहते वसुदेवजीका हृदय प्रेमसे गद्गद हो गया। उन्हें नन्दबाबाकी मित्रता और उपकार स्मरण हो आये। उनके नेत्रोंमें प्रेमाश्रु उमड़ आये, वे रोने लगे॥ ६५॥

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