svajanānuta bandhūn vā na paśyati yayāndhadṛk|| 64
अर्थ
दूसरोंको सम्मान देकर स्वयं सम्मान न चाहनेवाले भाईजी! जो कल्याणकामी है उसे राज्यलक्ष्मी न मिले—इसीमें उसका भला है; क्योंकि मनुष्य राज्यलक्ष्मीसे अंधा हो जाता है और अपने भाई-बन्धु, स्वजनोंतकको नहीं देख पाता॥ ६४॥
मा राज्यश्रीरभूत् पुंसः श्रेयस्कामस्य मानद।
स्वजनानुत बन्धून् वा न पश्यति ययान्धदृक्॥ ६४
दूसरोंको सम्मान देकर स्वयं सम्मान न चाहनेवाले भाईजी! जो कल्याणकामी है उसे राज्यलक्ष्मी न मिले—इसीमें उसका भला है; क्योंकि मनुष्य राज्यलक्ष्मीसे अंधा हो जाता है और अपने भाई-बन्धु, स्वजनोंतकको नहीं देख पाता॥ ६४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.64 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 651) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/84/64/