॥ श्रीहरिः ॥
जनेभ्यः कथयांचक्रुर्यदुदेवमहोत्सवम्।
यदासीत्तीर्थयात्रायां सुहृत्सन्दर्शनादिकम्॥ ७१
janebhyaḥ kathayāṃcakruryadudevamahotsavam|
yadāsīttīrthayātrāyāṃ suhṛtsandarśanādikam|| 71
अर्थ
वहाँ जाकर उन्होंने सब लोगोंसे वसुदेवजीके यज्ञमहोत्सव, स्वजन-सम्बन्धियोंके दर्शन-मिलन आदि तीर्थयात्राके प्रसंगोंको कह सुनाया॥ ७१॥✎ 1718
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
तीर्थयात्रानुवर्णनं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः॥ ८४॥
जनेभ्यः कथयांचक्रुर्यदुदेवमहोत्सवम्।
यदासीत्तीर्थयात्रायां सुहृत्सन्दर्शनादिकम्॥ ७१
वहाँ जाकर उन्होंने सब लोगोंसे वसुदेवजीके यज्ञमहोत्सव, स्वजन-सम्बन्धियोंके दर्शन-मिलन आदि तीर्थयात्राके प्रसंगोंको कह सुनाया॥ ७१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.71 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 652) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/84/71/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1718 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मानने-वाले → माननेवाले