श्रीभगवान्के द्वारा वसुदेवजीको ब्रह्मज्ञानका उपदेश तथा देवकीजीके छः पुत्रोंको लौटा लाना
श्रीबादरायणिरुवाच
अथैकदाऽऽत्मजौ प्राप्तौ कृतपादाभिवन्दनौ।
वसुदेवोऽभिनन्द्याह प्रीत्या संकर्षणाच्युतौ॥ १
athaikadā''tmajau prāptau kṛtapādābhivandanau|
vasudevo'bhinandyāha prītyā saṃkarṣaṇācyutau|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इसके बाद एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी प्रातःकालीन प्रणाम करनेके लिये माता-पिताके पास गये। प्रणाम कर लेनेपर वसुदेवजी बड़े प्रेमसे दोनों भाइयोंका अभिनन्दन करके कहने लगे॥ १॥
अथैकदाऽऽत्मजौ प्राप्तौ कृतपादाभिवन्दनौ।
वसुदेवोऽभिनन्द्याह प्रीत्या संकर्षणाच्युतौ॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इसके बाद एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी प्रातःकालीन प्रणाम करनेके लिये माता-पिताके पास गये। प्रणाम कर लेनेपर वसुदेवजी बड़े प्रेमसे दोनों भाइयोंका अभिनन्दन करके कहने लगे॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 652) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/85/1/