वसुदेवजीने बड़े-बड़े ऋषियोंके मुँहसे भगवान्की महिमा सुनी थी तथा उनके ऐश्वर्यपूर्ण चरित्र भी देखे थे। इससे उन्हें इस बातका दृढ़ विश्वास हो गया था कि ये साधारण पुरुष नहीं, स्वयं भगवान् हैं। इसलिये उन्होंने अपने पुत्रोंको प्रेमपूर्वक सम्बोधित करके यों कहा—॥ २॥
मुनीनां स वचः श्रुत्वा पुत्रयोर्धामसूचकम्।
तद्वीर्यैर्जातविश्रम्भः परिभाष्याभ्यभाषत॥ २
वसुदेवजीने बड़े-बड़े ऋषियोंके मुँहसे भगवान्की महिमा सुनी थी तथा उनके ऐश्वर्यपूर्ण चरित्र भी देखे थे। इससे उन्हें इस बातका दृढ़ विश्वास हो गया था कि ये साधारण पुरुष नहीं, स्वयं भगवान् हैं। इसलिये उन्होंने अपने पुत्रोंको प्रेमपूर्वक सम्बोधित करके यों कहा—॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 652) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/85/2/