श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

गुणप्रवाह एतस्मिन्‍नबुधास्त्वखिलात्मनः।

गतिं सूक्ष्मामबोधेन संसरन्तीह कर्मभिः॥ १५

guṇapravāha etasminnabudhāstvakhilātmanaḥ|

gatiṃ sūkṣmāmabodhena saṃsarantīha karmabhiḥ|| 15

अर्थ

यह जगत् सत्त्व, रज, तम—इन तीनों गुणोंका प्रवाह है; देह, इन्द्रिय, अन्तःकरण, सुख, दुःख और राग-लोभादि उन्हींके कार्य हैं। इनमें जो अज्ञानी तुम्हारा, सर्वात्माका सूक्ष्मस्वरूप नहीं जानते, वे अपने देहाभिमानरूप अज्ञानके कारण ही कर्मोंके फंदेमें फँसकर बार-बार जन्म-मृत्युके चक्करमें भटकते रहते हैं॥ १५॥

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