॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.85.15
गुणप्रवाह एतस्मिन्नबुधास्त्वखिलात्मनः।
गतिं सूक्ष्मामबोधेन संसरन्तीह कर्मभिः॥ १५
guṇapravāha etasminnabudhāstvakhilātmanaḥ|
gatiṃ sūkṣmāmabodhena saṃsarantīha karmabhiḥ|| 15
अर्थ
यह जगत् सत्त्व, रज, तम—इन तीनों गुणोंका प्रवाह है; देह, इन्द्रिय, अन्तःकरण, सुख, दुःख और राग-लोभादि उन्हींके कार्य हैं। इनमें जो अज्ञानी तुम्हारा, सर्वात्माका सूक्ष्मस्वरूप नहीं जानते, वे अपने देहाभिमानरूप अज्ञानके कारण ही कर्मोंके फंदेमें फँसकर बार-बार जन्म-मृत्युके चक्करमें भटकते रहते हैं॥ १५॥