परमेश्वर! मुझे शुभ प्रारब्धके अनुसार इन्द्रियादिकी सामर्थ्यसे युक्त अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ। किन्तु तुम्हारी मायाके वश होकर मैं अपने सच्चे स्वार्थ-परमार्थसे ही असावधान हो गया और मेरी सारी आयु यों ही बीत गयी॥ १६॥
यदृच्छया नृतां प्राप्य सुकल्पामिह दुर्लभाम्।
स्वार्थे प्रमत्तस्य वयो गतं त्वन्माययेश्वर॥ १६
परमेश्वर! मुझे शुभ प्रारब्धके अनुसार इन्द्रियादिकी सामर्थ्यसे युक्त अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ। किन्तु तुम्हारी मायाके वश होकर मैं अपने सच्चे स्वार्थ-परमार्थसे ही असावधान हो गया और मेरी सारी आयु यों ही बीत गयी॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 654) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/85/16/