श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

सूतीगृहे ननु जगाद भवानजो नौ

संजज्ञ इत्यनुयुगं निजधर्मगुप्त्यै।

नानातनूर्गगनवद् विदधज्जहासि

को वेद भूम्‍न उरुगाय विभूतिमायाम्॥ २०

sūtīgṛhe nanu jagāda bhavānajo nau

saṃjajña ityanuyugaṃ nijadharmaguptyai|

nānātanūrgaganavad vidadhajjahāsi

ko veda bhūmna urugāya vibhūtimāyām|| 20

अर्थ

प्रभो! तुमने प्रसव-गृहमें ही हमसे कहा था कि ‘यद्यपि मैं अजन्मा हूँ, फिर भी मैं अपनी ही बनायी हुई धर्म-मर्यादाकी रक्षा करनेके लिये प्रत्येक युगमें तुम दोनोंके द्वारा अवतार ग्रहण करता रहा हूँ।’ भगवन्! तुम आकाशके समान अनेकों शरीर ग्रहण करते और छोड़ते रहते हो। वास्तवमें तुम अनन्त, एकरस सत्ता हो। तुम्हारी आश्‍चर्यमयी शक्ति योगमायाका रहस्य भला कौन जान सकता है? सब लोग तुम्हारी कीर्तिका ही गान करते रहते हैं॥ २०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें