श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वसुदेवजीके ये वचन सुनकर यदुवंशशिरोमणि भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराने लगे। उन्होंने विनयसे झुककर मधुर वाणीसे कहा॥ २१॥
आकर्ण्येत्थं पितुर्वाक्यं भगवान् सात्वतर्षभः।
प्रत्याह प्रश्रयानम्रः प्रहसञ्श्लक्ष्णया गिरा॥ २१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वसुदेवजीके ये वचन सुनकर यदुवंशशिरोमणि भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराने लगे। उन्होंने विनयसे झुककर मधुर वाणीसे कहा॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 655) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/85/21/